आओ सुनाऊं तुम्हें मेरे महाकुंभ सफर की कहानी…

प्रयागराज , और इस पावन भूमि पर १४४ सालों के बाद लगा हुआ महाकुंभ का मेला…!!

इस महापर्व का अनुभव लेने की पहले दिन से ही बहुत इच्छा थी मन में. पर बहुत सी रुकावटें आई और अवसर नहीं मिल पा रहा था. सोचा शायद भगवान की यही मर्जी होगी. पर दिल के एक कोने में छोटी सी उम्मीद कायम थी.

और कहते हैं ना… Where there is a Will, There is a Way (जहां चाह वहां राह)

भगवान का बुलावा आगया🔔

प्रयागराज बस की टिकट मिल गई (Special Thanks to Vishal Sir)

बस फिर क्या मैं और मेरी सखी निकल पड़े झोला लेकर… एक अद्वितीय सफर का अनुभव लेने…
युपी का मेरा ये पहला ही सफर था. वहां की खास कुछ जानकारी हमें नहीं थी. हम तो भगवान भरोसे चल पड़े थे. हमें नहीं पता था कि हमारा यह सफर इतना दिलचस्प होने वाला है.🤞🏻

तो हमारा सफर शुरू होता है ७ फरवरी २०२५ (शुक्रवार) शाम ४:०० बजे. पहला दिन बस में आराम से गुजरा. Plan के हिसाब से हम शनिवार रात तक पहुंचने वाले थे.

पर भगवान की मर्जी कुछ और ही थी.

हम लगभग ११२५ किलोमीटर का सफर तय कर चुके थे. प्रयागराज अब २७५ किलोमीटर दूर था.
शनिवार शाम ६:३० बजे कटनी गांव (MP) के पास हम पहले ट्रैफिक जाम में फंसे. लगभग 4 घंटे तक हम उस जाम में अटके रहे. रात १०:३० बजे उस ट्रैफिक जाम से थोड़ी राहत मिली और हमारी बस फिर से दौड़ने लगी. पहले ही काफी देर हो चुकी थी तो ड्राइवर ने खाने के लिए नहीं रोका. हमें भी पहुंचने की होड़ थी तो हम Chips, Biscuits खाकर सो गए. सोचा कल सुबह तक पहुंच ही जाएंगे.

दिन तीसरा – रविवार
सुबह ७:०० बजे हम उठते हैं और खुद को अभी प्रयागराज से १०० किलोमीटर दूर पाते हैं. और हमें यह भी पता चलता है कि आगे और भी बहुत ट्रैफिक जाम लगा हुआ है. ऐसे ही धीरे-धीरे हमारी बस प्रयागराज से ५० किलोमीटर दूरी तक पहुंचती हैं (दोपहर के १२:०० बजे)

शनिवार शाम से कुछ खाया नहीं था. आसपास हाईवे पर सिर्फ चाय कॉफी की दुकानें थी. हाॅटेल का दूर दूर तक नामो निशान नहीं था.

दोपहर के २ बजे है और अब हम प्रयागराज से ४६ किलोमीटर दूरी पर है. और आप लोग यकीन नहीं करोगे, हमारी बस १ घंटे में सिर्फ एक किलोमीटर आगे बढ़ पा रही थी. हमारे ट्रेवल्स के कुछ सहचर बस से उतर के आगे निकल गए. हम कुछ लोग पीछे रूके और उनके फोन की प्रतीक्षा करने लगे. उनसे थोड़ा बहुत संपर्क हुआ तो पता चला कि आगे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ऑटो करके प्रयागराज पहुंचना पड़ेगा.

मैं और मेरी सहेली और ट्रेवल्स के हमारे कुछ सहचर शाम ४:०० बजे (अब प्रयागराज ४० किलोमीटर पर) ट्रेवल्स से उतर के प्रयागराज की दिशा में चल पड़े.

पहले हमें मिला एक ऑटो. उसने हमें गौहानिया गांव से थोड़ा पहले तक छोड़ा (प्रयागराज अब २३ किलोमीटर पर).

वहां पर कोई ऑटो नहीं था. पर वहां एक टेंपू खड़ा था. उसने हमें अरैल घाट तक छोड़ने का वादा किया. हाईवे पर पुरा ट्रेफिक जाम था तो वह हमें अंदर गांव के रास्ते से ले गया. उन गांव के छोटे और कच्चे रास्तों से टेंपु का वो सफर मेरे लिए सबसे यादगार रहेगा. जीवन में ऐसा अनुभव पहली बार ही लिया. पर उसने हमें अरैल घाट (जहां रहने की रुम थी) से ११ किलोमीटर पहले छोड़ा. उसके साथ काफी कहा-सुनी हुई. पर वो आगे चलने के लिए तैयार नहीं हुआ.

थोड़ा हताश होकर हम आगे निकले. दिल्ली अभी काफी दूर थी पर हमारी हिम्मत और सब्र अब भी टुटी नहीं थी. बल्कि हम तो दुगने जोश में आगे बढ़ रहे थे.
कम से कम प्रयागराज में तो हमनें प्रवेश कर लिया था – (रविवार शाम ७ बजे)

ऑटो वाले तैयार नहीं हो रहे थे जाम की वजह से. हम चलते रहे. थोडा आगे पुलिस खड़ी थी. उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि यूपी की सिटी बस अभी आएगी. उसमें बैठकर नैनी ब्रिज चले जाओ. तो हम बस की राह देखने लगे. काफी देर रुके पर बस नहीं आयी. तो हम और आगे चल दिए. थोड़ा चले तो पीछे से बस आती दिखी. और हम खुशी से झूम उठे…उत्तर प्रदेश सिटी बस में बैठने का अनुभव भी ले लिया.😃 वहां से उतरे नैनी ब्रिज (रात ९:३० बजे). अब हमारी रहने की जगह वहां से १५ किलोमीटर पर थी. १० किलोमीटर चल के फिर ऑटो करके हमारे रूम (Thanks to Shivshankar Sir) तक पहुंचे (रात १०:३० बजे). फिर फ्रेश होकर वहां पास के Mess में खाना खाया (३० घंटे बाद भोजन का आस्वाद लिया)

दो-तीन घंटे की नींद ली. प्रातः ३:०० बजे उठ के संगम के लिए निकल पड़े. वहां से संगम १५ किलोमीटर दूरी पर था. हम चलते रहे. थोड़ी दूरी पर ऑटो मिला. उसने संगम से ८ किलोमीटर पर छोड़ा. वहां से आगे सब यातायात बंद कर दी गई थी.

इस पूरे सफर में हम कितना चलें है हमें याद ही नहीं. पर उस भक्तिमय वातावरण में थकान महसूस ही नहीं हो रही थी. कुछ तो बात जरूर थी उन हवाओं में. हमारा उत्साह अब भी उतना ही था जितना ३ दिन पहले घर से निकलते हुए था. हमारी मंजिल धीरे-धीरे करीब आ रही थी. करोड़ों लोगों की भीड़ थी. भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. हम भी भीड़ के साथ संगम की और बढ़ते ही जा रहे थे (हमारे फोन में यादें समेटते समेटते)

और लगभग ६:३० बजे (सूर्योदय के समय) हम पहुंचे
“संगम स्नान घाट” पर 😍💃🏻

उस दिव्य-भव्य गंगा मैय्या को देखकर जो मुझे धन्यता महसूस हुई!😇
वो खुशी, वो प्रसन्नता, वो उत्साह, मैं तो क्या, दुनिया का कोई लेखक, कोई कवि शब्दों में बयां नहीं कर पाएगा. वह स्वयं अनुभूति करने से ही पता चले ऐसा भाव है!!🥰

हमने हमारी भक्ति और क्षमता के अनुसार गंगा मैय्या की पूजा विधि की. और अंतः जिसके लिए ये पूरा घाट रचा था…
वो “शुद्धि स्नान – पवित्र स्नान” हमनें यथोचित संपन्न किया.🙏🏻

उस एक डुबकी से हमारा जीवन धन्य हो गया, सफल हो गया.
ये अवसर तो बहुत नसीब वालों को प्राप्त होता है. मुझे भगवान ने ये अवसर दिया, उस लायक समझा, इसिमें मेरा जीवन कृतज्ञ हो गया.😌

मुझे जो मिला है वह अनमोल है!💠

स्नान होने के बाद हम वहां से निकले, थोड़ा आसपास घूमें. कुछ साधु, संत, अखाड़ों के आशिर्वाद लिए. मंदिरों में भीड़ काफी थी, तो बाहर से ही दर्शन हो पाए. हमारे पास वक्त की भी कमी थी. तो हम वापस रूम की तरफ प्रस्थान कर गए. हां और युपी के तुफानी Bike Riders की ‘धुम मचाले’ Driving Skills का भी मजा लिया.🤭

घर वापसी की ट्रैवल्स बुक कराई. ट्रैवल्स के पार्किंग तक पहुंचने में भी लगभग २ घंटे लग गए (सिर्फ ४ किलोमीटर की दूरी).
आखिरकार सोमवार शाम ५:०० बजे हम घर वापसी के लिए निकल पड़े (बहुत सारे अनुभव, अद्वितीय क्षण, यादें, सीख और धन्यता का पिटारा लेके)

और रास्ते में हमें पता चला कि हम ‘World’s Highest Traffic Jam’ (300 KM Long) का एक हिस्सा थे!🫣

मुझे मेरे इस पूरे सफर में एक बात का एहसास हुआ (बोध हुआ) –
हम जो कहते हैं की गंगा मैय्या में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं, असल में मुझे लगता है की पाप धुलने की प्रक्रिया गंगा मैय्या तक पहुंचने के सफर में ही शुरू हो जाती है और पहुंचते पहुंचते जिन कठिनाइयों का हम सामना करते हैं वह और कुछ नहीं हमारा प्रायश्चित होता है और फिर अंततः गंगा मैय्या में डुबकी लगाने के बाद हम पूर्ण रूप से शुद्ध और पवित्र महसूस करते हैं! 💖

।। जय महाकुंभ ।। 🚩
।। हर हर गंगे ।। 🌊
।। ओम विष्णवे नमः ।। 🏹
।। हर हर महादेव ।। 🔱

PS: Now I can say, I am God’s Favourite Child because he let me witness this Once in a Lifetime Event “THE MAHAKUMBH”😇🫠🥹💕🧿

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